गुरुवार, 8 मई 2008

इस आग को पानी नहीं हवा देने की जरूरत है

राजेन्द्र सिंह (तरुण भारत संघ)

जब हम अपने निर्णय से अपने-अपने स्थान पर सकारात्मक बदलाव के लिए छोटे-मोटे काम करने लगते हैं, तो इस धरती का, इस दुनिया का चेहरा निखर जाता है। हमें सुखद बदलाव दिखाई देता है। लेकिन जब हम बड़े-बड़े काम करने का आकर्षण मन में पाल लेते हैं, तो हम दुनिया का चेहरा तो बदलते हैं, पर उसे विकृत करके।

मुझे लगता है कि भारत विकास संगम के इस सम्मेलन में पानी पर बात नहीं करनी चाहिए। पानी पर तब बात करते हैं जब घर में आग लगी हो। यहां आए आप लोगों के मन में जो आग लगी है, उसे पानी नहीं हवा की जरूरत है, ताकि उसे और तेज किया जा सके। इसलिए इस वक्त मुझे दो-तीन बातें कहने का मन है। एक तो मैं ये मानता हूं कि इस हाल में और इस मंच पर जो लोग बैठें हैं, वो लोग पगडंडी पर चलने में विश्वास रखते हैं। इनके मन में ऐसी व्यवस्था बनाने का जज्बा है जिसपर सब चल सकें। वो एक ऐसा रास्ता चाहते हैं जिसपर इस देश का गरीब से गरीब और अमीर से अमीर आदमी साथ चल सके। लेकिन हकीकत यह है कि जिनके हाथ में आज की व्यवस्था है और जिस व्यवस्था से हम लड़ने के लिए तत्पर हैं, उसे चलाने वाले एक्सप्रेस हाइवे पर चलने को उतावले हैं। उनसे लड़ने के पहले हमें यह देखना होगा कि हमारी ताकत कितनी है। हमें यह सोचना होगा कि हम क्या करें जिससे सबको पीने के लिए पानी, खाने के लिए रोटी और पहनने के लिए कपड़ा मिल सके। जिस जज्बे के साथ हम जीना चाहते हैं, उस जज्बे को जीने वाले लोग हैं कौन और कितने हैं? कैसे हैं? क्या कर रहे हैं? यह सब हमें मालूम होना चाहिए। यह सच है कि वर्तमान व्यवस्था ठीक नहीं हैं, लेकिन यह भी सच है कि इसे बदलने की इच्छा रखने वाले हम लोग कमजोर हैं। मित्रेंजो सच्चाई को स्वीकार लेता है वही उससे पार भी पा सकता है। व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर पिछले वर्षों में जो कुछ हुआ है, उसे देखेते हुए मन कमजोर होता है। हमने देखा है कि व्यवस्था परिवर्तन की बात करने वाले लोग पहले अपने मन को, फिर अपने दिल को, अपने जमीर को, अपने विवेक को, अपने तन को, अपने रास्ते को और फिर अपना सब कुछ बदल लेते हैं। फिर वे दोहरा जीवन जीने के अभ्यस्त हो जाते हैं। वो जो कहते हैं उस पर खुद उन्हें भी यकीन नहीं होता। हमें रोज अपने से पूछना होगा कि क्या हम भी वही तो नहीं बन रहे हैं।

पवन श्रीवास्तव जी ने ठीक ही कहा कि बिहार के लोग कब्जा हटाने में माहिर हैं। यह सच है कि 77 के दौर में कब्जा हटाने में बिहार की अग्रणी भूमिका रही। लेकिन कब्जा हटाके हुआ क्या? कब्जा हटाने के बाद जिन्होंने कब्जा किया, उनके बारे में जब हम पता करते हैं तो फिर हम अपने को कमजोर महसूस करने लगते हैं। फिर हमें लगता है कि हमारे पैर बहुत कमजोर हैं। यह सच है कि हमारे भीतर जोश की कमी नहीं। हम समविचारी लोगों के साथ आने से एक-दूसरे को ताकत मिलती है। और उस ताकत से हम अच्छी रचना, अच्छा निर्माण, अच्छा संगठन करने में जुट जाते हैं। लेकिन कभी-कभी अपने घर में, अपनों के बीच अपनी कमियों की भी चर्चा करनी चाहिए। हमें सोचना चाहिए कि इस व्यवस्था को बदलने के लिए हमने पिछले तीस सालों में जो किया, वह क्यूं नहीं कारगर हुआ? अगर अब तक नहीं हुआ तो आज कैसे हो सकता है? हमें खुद से यह भी पूछना चाहिए कि क्या हम सचमुच व्यवस्था बदलना चाहते हैं? मुझे कभी-कभी लगता है कि हम सचमुच व्यवस्था बदलना नहीं चाहते। हम इस व्यवस्था में अपनी एक अच्छी पहचान, हम इस व्यवस्था में अपने को अच्छे से मजबूत करके दिखाना चाहते हैं। वास्तव में व्यवस्था बदलना नहीं चाहते।

मित्रो मुझे लगता है कि हमारे श्रध्देय आदरणीय गोविन्दाचार्य जी परिवर्तन के फरोधा रहे हैं। मैं उनसे कहना चाहता हूं कि तमाम कमजोरियों के बावजूद अभी-भी व्यवस्था परिवर्तन की संभावना समाप्त नहीं हुई है। लेकिन इस संभावना को कानूनी व्यवस्था में थोड़ा-बहुत परिवर्तन करके साकार नहीं किया जा सकता। सच कहें तो हम अपने संविधन में लिखे शब्दों को बदल कर व्यवस्था परिवर्तन नहीं कर सकते। यदि हम सचमुच व्यवस्था परिवर्तन करना चाहते हैं तो हमें उन लोगों तक पहुंचना होगा जो अपना रास्ता खुद बनाना जानते हैं। यहां इस सम्मेलन में वैसे ही लोग बैठे हैं। भले ही हम थोड़े से हाें, भले ही हम कमजोर हों, लेकिन हम लोगाें का जमीर, हम लोगों का विवेक, हम सबकी निष्ठा, हम सब का अपना स्वाभिमान बहुत मजबूत है। जब हम अपने निर्णय से अपने-अपने स्थान पर सकारात्मक बदलाव के लिए छोटे-मोटे काम करने लगते हैं तो इस धरती का, इस दुनिया का चेहरा निखर जाता है। हमें सुखद बदलाव दिखाई देता है। लेकिन जब हम बड़े-बड़े काम करने का आकर्षण मन में पाल लेते हैं, तो हम दुनिया का चेहरा तो बदलते हैं, पर उसे विकृत करके। इसलिए व्यवस्था परिवर्तन का जो भी कदम होगा, वो हमारे छोटे-छोटे कामों से होगा। उन छोटे-छोटे कामों से जिनको हम जहां बैठे हैं वहीं कर रहे हैं। यदि मैं राजस्थान के किसी गांव में बैठा हूं, तो मैं अपने राजस्थान के गांव की व्यवस्था को कैसे बढ़िया बना सकता हूं, यह सोचूं। मैं अपने गांव को एक गणराज्य कैसे बना सकता हूं, यह हमें सोचना होगा। जिस बाजार को हम वेश्या कहते हैं, उसकी भूमिका बदलकर, उसे सहायक और सहयोगी बनाने की जुगत हमें करनी होगी। हमें यह मालूम होना चाहिए कि इस वक्त लूट का सबसे बड़ा साधन बाजार है। उस बाजार पर लगाम कसनी बहुत जरूरी है।

दोस्तों! मैं कह सकता हूं कि हां मैं पढ़ा-लिखा हूं। मैंने कालेज और यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की है। लेकिन यह भी सच है कि मैंने जो पढ़ा था, वह कभी नहीं किया। मैंने तो वो किया, जो एक अनपढ़ किसान ने मुझे सिखाया। आज बड़े से बड़े इंजीनियर को, जो पानी का संकट रोता रहता है, उस अनपढ़ किसान से सीखने की, समझने की जरूरत है। मुझे लगता है कि इस देश के आम आदमी में स्वाभिमान और आत्मविश्वास खत्म हो गया है, उसे फिर से जगाने की जरूरत है। अगर ऐसा हो गया तो वह व्यवस्था बदलने के लिए खुद खड़ा हो जाएगा। तब वो फिर अपनी पालिर्यामेंट भी बना लेगा, अपने कानून-कायदे भी बना लेगा। वह फिर अपने लिए सब कुछ बना लेगा। तब व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई निर्णायक रूप से लड़ी जा सकेगी।

मित्रो, व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई बहुआयामी है। इसका एक मोर्चा पानी से भी जुड़ा है। आज के हालात में मुझे लगता है कि पानी को ले के एक बहुत बड़ा संकट सामने है। यह संकट जन-सामान्य को भी दिखने लगा है। अड़सठ में जिस तरह से अन्न का संकट था और अन्न के संकट को दूर करने के लिए आपकी डेमोक्रेटिक गवर्नमेंट ने एक फूड सिक्योरिटी एक्ट पास किया था, उसी तरह वाटर सिक्यूरिटी एक्ट लाने की योजना है। कहने को तो यह गरीबों के लिए पानी की उपलब्धाता सुनिश्चित करने के लिए है। लेकिन वास्तविकता कुछ और है। जब से शहरों में जमीन के भाव बढ़े हैं, तब से नदियों की जमीन पर कब्जा करने की होड़ मची है। रियल इस्टेट डेवलपमेंट के नाम पर पूंजीपति सरकार के साथ मिलकर नदियों पर कब्जा कर रहे हैं। उनके लिए नदी शहरों और उद्योगों का गंदा पानी ढ़ोने का माधयम भर है। इस देश में, जहां नदियों को मां कहते हैं, नदियों के स्वास्थ्य पर कोई धयान नहीं। आवाज नहीं है। एक जमाने में गंगा को लेकर बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ था। भागलफर के आस-पास उस वक्त कुछ मुट्टे उठे थे। कुछ छिट-फुट मुट्टे बंगलोर में, चेन्नई में भी उठ रहे हैं, पर ये सब बहुत टूटे हुए, बिखरे हुए हैं। मुझे हमेशा ये लगता है कि व्यवस्था परिवर्तन के लिए कुछ ऐसी चीजाें को लेके चला जाये जो हमारी अभी पकड़ में हों। पानी का मुद्दा अभी हमारी पकड़ से बाहर नहीं हुआ है। पानी जो पंच महाभूतों में से एक है, उसपर अभी तक कोई कानून ऐसा नहीं बना कि वह हमें इससे बेदखल कर दे। हालांकि एक वाटर पालिसी 2002 में जरूर बनी। इसके सेक्शन 13 में पानी पर मालिकाना हक, पानी में परिवहन आदि करने का हक प्राइवेट कंपनियों को देने की बात कही गई है। लेकिन यह अभी कानून नहीं है। उसको हम एक लात मार के तोड़ सकते हैं। अभी पानी हमारे हाथों में हैं। लेकिन आने वाले समय में यदि हमने इसे बचाने की कोशिश नहीं की तो दोस्ताें हमें भी यूरोप के आम लोगों की तरह रोना पड़ेगा। आने वाले दो सालों में हाइवे पर चलने वाले लोगों का हमारे संसाधनों पर इतनी तेजी से कब्जा होगा कि हम कुछ नहीं कर पाएंगे। क्योंकि चीजें बहुत तेजी से बदल रही हैं। जो गरीबों की बात करते हैं, जो दलितों की बात करते हैं, वे सब तेजी से बदल रहे हैं। उन सबको एक्सप्रेस हाइवे पर चलने का चस्का लगा हुआ है। नदियों की जमीन पर उन्हें सुपर हाइवे बनाने की जल्दी है। उनके लिए हाइवे बनाना जरूरी है, क्योंकि उसी में से उन्हें राज-काज चलाने के लिए जो भी कुछ चाहिए, वो आसानी से मिलता है। पगडंडी पर चलने से उनको कुछ नहीं मिलता। इसलिए वो पगडंडी पर चलने की बात नहीं करेंगे। वे तो हाइवे की ही बात करेंगे। उसके हाइवे से आपकी गंगा भाड़ में जाती है तो जाए, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। आपका किसान मरे तो मरे, उन्हें चिंता नहीं है। इसके बावजूद वे अपने को दलितों की नेता, गरीबों की नेता, महिलाओं की नेता, जेंडर सेंसिटिव सब कुछ कहलाने के लिए तैयार हैं। उस गंगा हाइवे के लिए वो बेशक बेताब हों लेकिन हम उसका विरोध करते हैं। हम इसलिए उसके विरोधी हैं, क्योंकि हम ये मानते हैं कि गरीब को भी पैदल चलने का हक है। पगडंडी पर तो सब चल सकते हैं। हाइवे पर गरीब नहीं चल सकता, दलित नहीं चल सकता। हाइवे पर उसकी बड़ी गाड़ी, सोलह पहियो वाली गाड़ी नहीं चलेगी। लेकिन मुझे नहीं मालूम कि मैं दलित नेताओं को कैसे समझाउफं कि हाइवे का रास्ता अमीर-गरीब के बीच की दूरी को बढ़ाएगा। गरीबों को बेघर करेगा।

मित्रो, मैं आप सबको व्यवस्था परिवर्तन का फरोध मानते हुए एक निवेदन करना चाहता हूं। एक छोटा सा निवेदन, वो ये कि हम जहां पर बैठे हैं। जहां पर रहते हैं। शहर में रहते हैं या गांव में रहते हैं। चाहे किसी मुहल्ले में रहते हैं, वहां की जो भी हमारी साझी सम्पदा है, जो भी जीवन चलाने वाला साधन है-नदी है, जंगल है, गोचर भूमि है, उस पर अपना हक बनाए रखें। उसके लिए कितना भी संघर्ष करना पड़े, पीछे न हटें। यह दुख की बात है कि नदी के पेट में खेलगांव बन रहे हैं, मंदिर बन रहे हैं और हम चुप हैं। संविधान में ऐसा करने के लिए नहीं लिखा है, लेकिन ऐसा हो रहा है। सारी नदियों में ऐसा निर्माण हो रहा है। गंगा में हो रहा है, यमुना में हो रहा है। अभी गंगा में जो हाइवे बनने वाला है, उसे रोकने की ताकत किसी में नहीं दिखती। मुझे कभी-भी बड़ी बातें अच्छी नहीं लगतीं। माफ करना। मुझे हमेशा छोटी बातें अच्छी लगती हैं। वे बातें जो मैं खुद कर सकता हूं। जो मैं नहीं कर सकता, उन पर बहस करना मुझे अच्छा नहीं लगता। इसलिए मित्रो, मुझे तो यही लगता है कि इस वक्त ये जो पानी का मसला है, उसे हमें पकड़ लेना चाहिए। पानी की लड़ाई अभी छोटी लड़ाई है, एक ऐसी लड़ाई जिसे हम लड़ सकते हैं।

(प्रस्तुति : नवलेश कुमार

2 टिप्‍पणियां:

roshini ने कहा…

Nice Post !
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विचार ने कहा…

मेरा एक विचार है, अगर सरकार बड़ी बड़ी योजनाओं से हटकर सिर्फ़ वृक्षारोपण पर ध्यान लगाये तो पर्यावरण और पानी की समस्या काफी हद तक हल हो सकती है. वृक्षारोपण करने और अपने लगाये वृक्षों की पूरी देखभाल करने वाले व्यक्तियों/संस्थाओं/कोर्पोरेशन को रोपित वृक्षों के हिसाब से इन्कम टेक्स/ प्रोपर्टी टेक्स में कुछ छूट देना शुरू कर दे. तो वृक्षारोपण की लोगों और कम्पनियों में होड़ लग जायेगी. हो सकता है भारत का वन क्षेत्र 35% फ़िर से पार कर जाए.