गुरुवार, 26 जून 2008

मुद्दा : वर्षा जल संरक्षण के बिना बेमानी हैं सभी प्रयास


ज्ञानेन्द्र रावत
जल संकट देश ही नहीं, समूचे विश्व की गंभीर समस्या है। दुनिया के विशेषज्ञों की राय है कि वर्षा जल संरक्षण को बढ़ावा देकर गिरते भूजल स्तर को रोका व उचित जल–प्रबंधन से सबको शुद्ध पेयजल मुहैया कराया जा सकता है। उनका मानना है कि यही टिकाऊ विकास का आधार हो सकता है। इसमें ंदो राय नहीं कि जल संकट ही आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौती होगी, जिस पर गौर करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है, वरना स्थिति इतनी भयावह होगी जिसका मुकाबला कर पाना असंभव होगा। इसलिए तेजी से कम होते भूजल को संरक्षित करने के लिए जल–प्रबंधन पर ध्यान दिया जाना बेहद जरूरी है। इसमें दो राय नहीं कि भूजल पानी का महत्वपूर्ण स्रोत है और पृथ्वी पर होने वाली जलापूर्ति अधिकतर भूजल पर ही निर्भर है। लेकिन आज वह चाहे सरकारी मशीनरी हो, उघोग हो, कृषि क्षेत्र हो या आम जन हों, सभी ने इसका इतना दोहन किया है, जिसका नतीजा आज हमारे सामने भूजल के लगातार गिरते स्तर के चलते जल संकट की भीषण समस्या आ खड़ी हुई है, बल्कि पारिस्थितिकीय तंत्र के असंतुलन की भयावह स्थिति पैदा हो गई है। हालात यहां तक खराब हो रहे हैं कि इससे देश में कहीं धरती फट रही है, कहीं जमीन अचानक तप रही है। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखण्ड, अवध व ब्रज क्षेत्र के आगरा की घटनाएं इसका प्रमाण हैं। ये संकेत देती हैं कि भविष्य में स्थिति विकराल रूप ले सकती है।
वैज्ञानिकों व भूगर्भ विशेषज्ञों का मानना है कि बुंदेलखण्ड, अवध, कानपुर, हमीरपुर व इटावा में यह सब पानी के अत्यधिक दोहन, उसके रिचार्ज न पाने के कारण जमीन की नमी खत्म होने, उसमें ज्यादा सूखापन आने, कहीं दूर लगातार हो रही भूगर्भीय हलचल की लहरें यहां तक आने व आगरा में पानी में जैविक कूड़े से निकली मीथेन व दूसरी गैसों के इकट्ठे होने के कारण जमीन की सतह में अचानक गर्मी बढ़ जाने का परिणाम हैं। यह भयावह खतरे का संकेत है, क्योंकि जब–जब पानी का अत्यधिक दोहन होता हैे, तब जमीन के अंदर के पानी का उत्प्लावन बल कम होने या खत्म होने पर जमीन धंस जाती है और उसमें दरारें पड़ जाती हैं। इसे उसी स्थिति में रोका जा सकता है, जब भूजल के उत्प्लावन बल को बरकरार रखा जाये। पानी समुचित मात्रा में रिचार्ज होता रहे। यह तभी संभव है जब ग्रामीण-शहरी, दोनों जगह पानी का दोहन नियंत्रित हो, संरक्षण, भंडारण हो ताकि वह जमीन के अंदर प्रवेश कर सके। जल के अत्यधिक दोहन के लिए कौन जिम्मेदार है, इस बारे में योजना आयोग के अनुसार भूजल का 80 फीसद उपयोग कृषि क्षेत्र द्वारा होता हैै। इसे बढ़ाने में सरकार द्वारा बिजली पर दी जाने वाली सब्सिडी जिम्मेदार है। आयोग की रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि यह सब्सिडी कम की जाये। वह, इस रूप में दी जाये ताकि किसान भूजल का उचित उपयोग करें। सब्सिडी के बदले किसान को निश्चित धनराशि नकद दी जाये। इससे भूजल का संरक्षण होगा तथा विघुत क्षत्र पर भी आर्थिक बोझ कम होगा। विश्व बैंक की मानें, तो भूजल का सर्वाधिक 92 फीसद उपयोग और सतही जल का 89 फीसद उपयोग कृषि में होता है। 5 फीसद भूजल व 2 फीसद सतही जल उघोग में, 3 फीसद भूजल व 9 फीसद सतही जल घरेलू उपयोग में लाया जाता है। आजादी के समय देश में प्रतिवर्ष प्रति व्यक्ति पानी की उपयोगिता 5,000 क्यूबिक मीटर थी, जबकि उस समय आबादी 40 करोड़ थी। यह उपयोगिता कम होकर वर्ष 2000 में 2000 क्यूबिक मीटर रह गयी और आबादी 100 करोड़ पार कर गई। 2025 में यह घटकर 1500 क्यूबिक मीटर रह जाएगी, जबकि आबादी 1 अरब 39 करोड़ हो जाएगी। यह आंकड़ा 2050 तक 1000 क्यूबिक मीटर ही रह जाएगा और आबादी 1 अरब 60 करोड़ को पार कर जाएगी।
आयोग के मुताबिक, 29 फीसद इलाका पानी की समस्या से जूझ रहा है। हकीकत यह है कि जल संकट गहराने में उघोगों की अहम भूमिका है। विश्व बैंक मानता है कि कई बार फैक्ट्रियां एक ही बार में उतना पानी जमीन से खींच लेती हैं, जितना एक गांव पूरे महीने में भी न खींच पाये! सवाल है कि जिस देश में भूतल व सतही विभिन्न साधनों के माध्यम से पानी की उपलब्धता 2300 अरब घनमीटर है और जहां नदियों का जाल बिछा हो, सालाना औसत वर्षा 100 सेमी से भी अधिक होतीे है, जिससे 4000 अरब घनमीटर पानी मिलता हो, वहां पानी का अकाल क्यों है? असल में वर्षा से मिलने वाले जल में से 47 फीसदी यानी 1869 अरब घनमीटर पानी नदियों में चला जाता है। इनमें से 1132 अरब घनमीटर पानी उपयोग में लाया जा सकता है लेकिन इसमें से भी 37 फीसद उचित भंडारण–संरक्षण के अभाव में समुद्र में चला जाता है जो बचाया जा सकता है। इससे काफी हद तक पानी की समस्या का हल निकाला जा सकता है।

कोई टिप्पणी नहीं: