गुरुवार, 24 अप्रैल 2008

ये आपका ही हिमालय है


नवभारत टाइम्स, बद्री दत्त कसनियाल, वरिष्ठ पत्रकार

लगभग पांच करोड़ साल पहले अस्तित्व में आई हिमालय की पहाड़ियां विश्व की सबसे जवान व सुंदर पहाड़ियां हैं। जिस तरह आज अमेरिकन व यूरोपियन हिमालय को देखकर स्तब्ध रह जाते हैं वैसे ही तीन हजार साल पहले हिमालय ने वैदिक आर्य को भी नतमस्तक कर दिया था। जब आर्य के दल गंगा-सिन्धु के मैदान से उत्तर की ओर बढ़े, तो उन्हें एक विशाल पर्वत श्रृंखला के दर्शन हुए। नतमस्तक वैदिक आर्य अपनी संस्कृति के विकास के बीज हिमालय की तलहटी में ही बोये थे, यहीं पर आश्रम बनाए, यहीं चिंतन किया और यहीं वैदिक व सनातनी संस्कृति के मूल आधारों का उदय हुआ।

रॉयल जोग्राफिकल सोसायटी के पूर्व प्रेजिडेंट सर फ्रांसिस यंग हस्बैन्ड ने एक जगह लिखा है कि, 'हिमालय के कारण ही हिंदुओं में धार्मिक भावनाओं का उदय हुआ, इसीलिए हिन्दुओं के अधिकांश तीर्थस्थल हिमालय में ही अवस्थित हैं'। जिस हिमालय में ऋग्वेद काल में अपनी व्यापक हलचलों के कारण रुद्र का जन्म हुआ, वहीं हिमालय पौराणिक काल में शांत स्वरूप वाले मंगलकारी देवता भगवान शंकर का निवास स्थान बन गया। आर्य हिमालय के पास जाकर उसकी कोमलता और संवेदनाओं को महसूस करते थे।

पौराणिक काल में राजा भगीरथ अपने पुरखों के कल्याण के लिए जिस गंगा को उच्च हिमालय से धरती पर लाए, वह गंगा सैकड़ों सालों से पतित पावनी व जीवन दायिनी एक ऐसी अविकल जलधारा बनी हुई है, जो कोलकाता में समुद्र में विलीन होने से पहले अपने 2500 किलोमीटर के सफर में ५० करोड़ से अधिक लोगों को जीवन देती है और अपनी आध्यात्मिकता के कारण सारे विश्व को आकर्षित करती है।

लेकिन आज यह पौराणिक नदी अपने मूल स्थान पर ही प्रदूषित हो गई है। गोमुख से गंगोत्री तक और ऋषिकेश से इलाहाबाद तक गंगा कहीं पर्यटकों द्वारा दूषित है, तो कहीं कारखानों द्वारा। प्रदूषण से इस नदी के जल के स्वास्थ्यदायक तत्व समाप्त हो रहे हैं। आज पर्यावरण वैज्ञानिक इस बात पर भी शंका व्यक्त करने लगे हैं कि कहीं अगले 100-200 सालों में यह धारा गंगासागर तक पहुंचे ही नहीं। हिमालय के कष्टों के तत्व उसके गठन में ही अंतर्निहित हैं।

5 करोड़ वर्ष पहले अफ्रीकी प्लेट के एशियाई प्लेट से टकराने और उस प्रक्रिया के लगातार जारी रहने के कारण सदियों से हिमालय में जो सहनशीलता संचित थी, उसे सबसे पहले अंग्रेज उपनिवेश वादियों ने छेड़ा। भारतीय परंपरा में हिमालय सघन वनों और ऋषि मुनियों के गुरुकुलों के ही निमित्त था, पर अंग्रेजों ने अपने लाभ के लिए हिमालयी वनों का जो अंधाधुंध दोहन किया, तब से ही हिमालय ने अपना रौद्र रूप दिखाना शुरू किया और हिमालय के प्रतिवाद की मार सबसे ज्यादा हिमालय वासियों पर पड़ी जहां पिछले 100 सालों से छोटे बड़े भूकंपों, भू-स्खलनों और अचानक आने वाली बाढ़ों के कारण हिमालयवासी अब इस रुद्र के तांडव को हर वर्ष सहने को मजबूर हैं।

हिमालय को घायल करने वाले या तो लौटकर अपने देश ब्रिटेन चले गए या फिर आज दिल्ली से न्यू यॉर्क तक महानगरों में रहते हैं, लेकिन उनके दुष्प्रयत्नों की मार हिमालयवासी अपने शांत जीवन के बिखराव के रूप में भोगने को मजबूर हैं। कभी संस्कृत के महाकवि कालिदास का देवात्मा हिमालय आज सारे विश्व में बढ़ती गर्मी के बड़े प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है। देशी-विदेशी वैज्ञानिक हिमालय के ग्लेशियरों के लगातार पिघलने और इसकी नदियों में पानी कम होने के लगातार नए-नए तथ्य रोज जारी कर रहे हैं।

लेकिन आज तक कोई ऐसा अध्ययन नहीं हुआ, जिसमें हिमालय के बदलने का हिमालय वासियों पर असर दिखाया गया हो। ना ही किसी ने ऐसा अध्ययन किया है, जिसमें हिमालय क्षरण के भारतीय जीवन पर पड़ने वाले नकारात्मक पक्ष दिखाए गए हों।

देश की आजादी के नेताओं महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू के हिमालय प्रेम के कारण कभी योजना आयोग के पर्वतीय प्रकोष्ठ में पैदा हुई हिमालय के प्रति संवेदना आज हिमाचल, उत्तराखंड, अरुणाचल, सिक्किम व जम्मू-कश्मीर राज्यों के रूप में पूरी संवैधानिक शक्ति के साथ सक्रिय है। पर हिमालय भौगोलिक रूप से भी बिखर रहा है, पर्यावरणीय रूप से भी और सामाजिक रूप से भी।

अब हिमालय के परंपरागत पेशे, सीढ़ीदार खेती और इस खेती को सहयोग देने वाले शिल्प धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं, जिसके पर्यावरणीय कारण भी हैं, भौगोलिक भी और आर्थिक भी। हिमालय का आर्थिक उत्पादन यहां के निवासियों को 15 हजार रुपया प्रतिव्यक्ति से अधिक औसत आय नहीं दे रहा, जबकि हिमालयी राज्यों के बराबर भौगोलिक क्षेत्रफल वाले पंजाब, हरियाणा, हरित श्वेत व नीली क्रांतियों के पहले चरण में ही इससे तीन गुना अधिक प्रतिव्यक्ति आय वाले राज्य बने गये हैं, पर हिमालय या तो गंगा प्रदूषण के कारण खबरों में आता है या ग्लेशियर पिघलने के कारण।

हिमालयवासियों की लगातार हो रही अवनति के कारण यह क्षेत्र कभी देश-विदेश की मीडिया को आकर्षित नहीं करता। सरकारें इसे या तो अभयारण्य बनाने में तुली हैं या फिर महानगरी विलासिता के लिए जल विद्युत व पानी के स्रोत के रूप में विकसित करने में, इनमें हिमालयवासियों के लिए कोई स्थान नहीं उनके लिए चंद रुपयों के मुआवजे के बाद पलायन ही एक मात्र रास्ता बचता है।

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